मुसाफ़िर
मैं भटकता मुसाफ़िर हूँ, मंज़िल की तलाश में दर-दर,
न कोई ओर दिखती है, न कोई छोर दिखता है।
इधर भी रास्ता
तन्हा, उधर भी है अकेलापन,
यहाँ की शाम बोझिल है, वहाँ हर रात
अँधेरापन।
मेरी तक़दीर की कोरी पटल पर एक स्याही है,
वही श्यामल, वही भारी अमावस सी काली है।
मुकम्मल हो
मुक़द्दर हर मुसाफ़िर का नहीं वाज़िब,
कहीं बस रास्ते ही हैं, मुक़र्रर चलने को
तन्हा।
कहीं मंज़िल भी है
जो राह को पहचान देती है,
कहीं राही भी हैं जो चल रहे पहचान पाने को।
मेरे इन रास्तों
को शायद नहीं दरकार मंज़िल की,
या मंज़िल ही नहीं मेरे सफ़र की अब तलक कोई।
कहीं ऐसा न हो इन
रास्तों में ही हो बसर मेरा,
न मिली सकी जो इस सफ़र में , वो होना लाज़िमी
न हो।
अन्नु मिश्र

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